मौसम

एक बूँद गिरी मेरे बदन पर. तो लगा शायद बिल्डिंग के नीचे खड़ा हू तो किसी ने पानी डाला होगा. या फिर पेड़ पोधो को डालने वाला पानी गिरा होगा. पर उपर देख ही लेना चाहिए कुछ भरोसा नही है लोगो का कभी कभी मूह से भी पिचकारी उड़ाते है.

एकांत...Ekant

अकेले बैठे सुना है कभी खामोशी को? मन जब शांत होता है, अपनी सारी और देखलो फिर भी कोई नज़र नही आता, बस मैं और सिर्फ़ मैं.......... एकांत मैं रहेना और खुद से बाते करने मे एक अलग मज़ा है. अपने आप के लिए कुछ देर वक़्त निकालना.

pratibimb-mirror

प्रतिबिंब एक अक्स दिखता है दूसरी और , अपना सा लगता है कभी सपना सा लगता है , कभी उसी पर प्यार आता है तो कभी गुस्सा आता है, कभी घंटो बिता देते है , कभी एक जलक देख कर निकल जाता है, बस हर वक़्त अपनापन जताता है, अपनी ही जालक दिखा ता है वो.............वो है प्रतिबिंब....

नरीमन पॉइंट........Nariman point

नरीमन पॉइंट......... मुंबई मैं आई हुवी एक एसी जगह, जहा कई लोगो के कई अरमान जुड़े हुवे है. जी हा ,आज मैं उस जगह खड़ा हू जहा से एक कदम आगे मौत और एक कदम पीछे जिंदगी खड़ी है. नरीमन पॉइंट........

God - Great Organiser and Destroyer

भगवान एक मज़ा देखा है आपने बड़े मंदिरो मैं हमेशा क़Q रहेगा..अरे अब भगवान को मिलने के लिए भी लाइन लगानी पड़ती है. जैसे दरदी बिना आपॉइंटमेंट डॉक्टर को नही मिल सकते वैसे जिंदगी के दर्दीओ को लाइन लगानी पड़ती है. डॉक्टर एक बीमार अनेक. वहा भी पैसे लेते है ओर यहा पैसे चढ़ते है..संभाल लेना भगवान थोड़ा टेन्षन चालू है. उन्हे खुश करने के लिए फूल भी चढ़ाते है विथ मिठाई. इतना गर्लफ्रेंड के लिए करेंगे तो कम से कम वो दिन प्रसाद ज़रूर मिल जाएगा.

Saturday, June 18, 2016

ना बारिश आ रही थी ना वो। बादल आसमान में छाये तो थे पर कब बरसेंगे वो राज़ था । बीलकुल मेरी प्रियतमा के जैसे, आज उनकी एक जलक दिखेगी या नहीं ,उनकी नज़रे मुझसे मिलेगी या नहीं, बस ये सवाल आँखोंमें लिये कॉलेज के परिसर में खड़ा था। कभी उस ऊँची ईमारत को देखता तो कभी बादलो को। ये समय गुज़र क्यों नहीं रहा था बार बार नज़र जभी घडी पर जाती लगता जाने फेविकॉल लगा के कांटे रुक गये हे। बस बार बार 11.57 ही दिखाते है। दो तिन् बार घडी टटोल ली , नज़रे साफ़ करली पर समय वही का वही still rock. कुछ लड़के सिगरेट पि रहे थे । श्वेत रंग धूम्रपान, धुँवा उड़ रहा था सीना छन्नी हो रहा था पर बेखबर अपने में ही मज़े लिए जा रहे थे। बस उसी तरह धुंधला धुँवा मेरी आँखों में था और सीने में उनसे मिलने की जलन लीये बेखबर दुनिया से इंतज़ार के कड़वे घूंट पिये जा रहा था ,कब आओगे तुम...
कॉलेज की घंटी बजी जैसे कानो से सीधी दिल को दस्तक दे गई। कोई आने को हे ये ख़बर दे गई। ओह्ह्ह आखिर 12 बजे । कॉलेज के क्लास रूम से भीड़ निकली लेक्चर खत्म हुवा। सीढ़ी यो पर भीड़ बढ़ने लगी लोगो के चहेरे दिखने लगे पर ....पर वो एक चहेरा नहीं दिख रहा था। वो कहा गई? कितनी आलसी हे जल्दी आती नहीं, या आई ही नहीं? कुछ किलबिल करती आवाजे आती थी उनमे उसकी आवाज हे की नहीं? कान जैसे रडार की तरह ग़ुम रहे थे। कुछ के सिर्फ बाल दिख रहे थे तो कुछ की फिगर , कुछ साइड के चहेरे तो किसी की सिर्फ ड्रेस। उफ्फ्फ ये क्या पर इन सब में वो नहीं नज़र आ रही। ऊपर जा के देख आउ? क्या सहेली मिली होगी तो बैठ गई होगी गाउँ भर की बाते लेकर। निचे आकर बाते नहीं कर सकती क्या? खयालो के पुलाव पकाने के बिच में ऊपर से जोर से गिरने की आवाज़ आई, शोर बढ़ गया हँसी की सिस्कारिया निकल रही थी। साला अपनी वाली तो नहीं गिरी ना? अगर वो होगी तो सब के जबड़े तोड़ दूंगा , "चल ऊपर चल"। दो दो सीढ़िया चढ़ कर पैर तो जैसे बुलेट की तरह भागने लगे। बस ऊपर जाके देखा ओह्ह्ह
 दो लडकिया गिरी थी। ध्यान से नज़दीक गया । आँखे उल्लू की तरह चौड़ी होगई। पर जुल्फे इतनी चहेरे पर छाई थी की समज नहीं आ रहा था। तभी एक हाथ बढ़ा उनकी तरफ , पिंक चूड़ियों की खनखनाहट हुवी। हाथ को देख कर नज़रे थम गई। वो चूड़ियों से लेकर उनके चहेरे तक का नज़रो का सफ़र जैसे हिमालय की राहो में चलते हुवे बर्फ की पहाड़ी को देखने जैसा आनंद। वो मुस्कुराता गुलाबी चहेरा उसपर ये गुलाबी ड्रेस, उसपर गुलाबी गाल, उसपर गुलाबी होठ, उसपर गुलाबी बिंदी। हायय य य.... मरे तो किस चीज़ पर मरे..... गुलाबी माहोल बना रही थी उनकी हँसी। लडकिया उठी , हँसी और सारी एकदम से चल दी......

 मैं वही खड़ा रहा ,देखता रहा जाते उनको। गई गई और आँखों से ओजन हो गई

 मै वही खड़ा ग़ुम सुम , ग़ुप चुप.... दोस्तों की आवाज़े आइ "भाई अब गेट को लॉक लगाने का काम तुजे दिया हे क्या? घर नहीं जाना? बारिश की छिंटे शुरू हो गई हे …......."

Monday, September 8, 2014

visarjan

Raaste per bahot shor tha. Dekha to ek tempo ke piche bahot sare samaj ke bhawishya ( young bachhe) nach rahe the. DJ. Lagaya tha aur tempo main jankh kar dekha to Humare Ganpati ji biraj maan the. Pucha to pata chala Visarjan ko ja rahe hai...
Bebi doll main sone di...lungi dance ke ati priay gito pe log jum rahe hai aur thodi thodi der mai ganpati ke pass jakke unhe bhi ishare kar rahe hai.ek pal aaisa laga ki abhi ganpati ji ko pitambari ke badle lungi pahena denge...ek don thin char ganpati cha jai jai kar ke lok slogan ke badle char bottle vodka ne le li thi..munni badnam huvi ganpati tere liye hi bajna baki tha...kya ye hai apni sanskruti? Kis prakar visarjan hona chahiye ye pata bhi nahi...Ganpati ke sthapna ki vaha society main to ye pata karna mushkil ho jata hai ki ganpati sthapit huve hai ya yo yo honeysingh...?
D.J. kis occasions main bajate hai wahi bhul gaye hai..bas nachna hai yehi moto rahe gaya...wo bhi nagin dance karna ya khuch sabhya nach hota hai wah bhi bhul gaye..kya Ganpati ko ye sab chahiye? Unko aane ka perpous kya hai....jate waqt ankho main pani hona chahiye ya dil hai pani pani song per thirak te kadam....
Visarjan prabhu ka ho raha hai ya humaro sanskruti ka....? 

Wednesday, September 3, 2014

home


Friday, August 8, 2014

chacha choudhary comics by PRAN

डायमंड कोमिक्स का नाम तो सुनाही होगा। अगर नहीं, तो चाचा चौधरी का
 नाम ? जिसके कार्टूनिस्ट और उत्पन करता थे “मिस्टर प्राण”। जिनका स्वर्गवास लास्ट बुधवार को हुवा। उन्हे मेरी तरफ से एक चोटी सी श्रद्धांजलि।

मेरे बचपन के उन खूबसूरत लम्हो मे इनके कॉमिक्स ने भी मेरा खूब साथ निभाया था। जभी मैं अपने मामा के घर कांदिवली जाता तो दो नो कंदर्पमामा और मनीषमामा से मुजे खूब सारे कॉमिक्स पढ़ने को मिलते थे। उन मे से सब से जादा पढ़ा था मैंने चाचा चौधरी। शायद उस वजह से मेरे अंदर का कॉमिक पात्र भी जागृत है। छोटी छोटी सामाजिक और रोज़ बरोज की बातो मैं से वो हास्य की धारा ए अपने कॉमिक्स मे प्रदर्शित करते थे। वहा साई बाग मे मेरे हम उम्र के दोस्त और रिश्ते दार थे तो जाना अछा लगता था, पर अब तो इन कोमिक्स के वजेसे और आदत सी पद गई थी।   वो आदत मेरी घर तक आ पाहुची। और ठाणे मे भी मैं इन कॉमिक्स के लिए दुकानों मे भटक ने लगा था। कुछ पैसे पापा मम्मी से मांग के तो कुछ अपनी बचत से जमा करके कॉमिक्स खरीद लता था। शुरू मे वहा कोई मेरा दोस्त नहीं था सो टाईम पास करने के लिए इस कॉमिक्स से बढ़िया दोस्त हमदर्द और फिलोसोफ़र और कोई न था।

 मेरा जिंदगी का बहोत सारा वक़्त इन कॉमिक्स ने सावरा है। घर मे जब दुपहर को मम्मी सो जाती तो मैं कीचेन मे  अलमारी के आईने के सामने जाके कभी चाचा चौधरी बनता तो कभी साबू बनके कई अदृश्य गुंडो की जम के धुलाई करता। वो भी क्या दिन थे। फिर हम बड़े होते गए कॉमिक्स का जमाना कम्प्युटर लेने लगा। स्कूल और क्लासिस के चक्कर मैं दुनिया बदलने लगी। सब अपने कामो मैं बिज़ि होने लगे और आज बच्चों को मोबाइल के आलवा कोई चीज नहीं दिखती।

 मेरी जिंदगी मे आप का स्थान हमेशा दिल के एक कोने मे महेफुस रहेगा। तहे दिल से शुक्रिया आपका। बुजुर्ग कहेते है की स्वर्ग मे एक अलग दुनिया है तो उम्मीद करता हु स्वर्ग मे भी आप अपने कॉमिक्स की सिरीज़ निकाल कर वहा के लोगो मे जीने के लिए नए प्राण भर देंगे।


धन्यवाद

जिगर              

Thursday, April 11, 2013

આસું નું ટીપું / tears

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આસું નું ટીપું હતું કે 
હતું તારી વેદનાનું જાકળ 

અમે શોધી રહ્યાતા એમાં પ્રેમ અમારો 
અને એ નીકળ્યું અમારીજ ભૂલ નું એક કારણ 

Saturday, March 23, 2013


ek story likhi thi maine.....( college main ek couple tha.  ladka  kai saalo ke baad uski so called girl friend ko dur se dekhta hai. aur use purani yaade taja ho jati hai. us waqt phone nahi the chitti se hi kaam chalana padta tha. to sab se pahele boy chitti likhta hai)

b: ladke ne likhe huve latter.   g: ladki ne likhe huve latter
first letter after lots of year from boy to girl 
b :- hi how r u ? achi hi hogi warana meri yaad itne saalo mai ek baar to aati , aur khuch to baate mujse tum karti anyway just joking ye tum surprice to nahi huvi na aur ho gai to chalo acha hai mere sur per koi to price lagayega ..yu achanak kaise yaad agai kahoge to wo maine fir kabhi bataunga kya kar rahe ho aaj kal
g :- ya i m fine actully in pink after reading your latter. yaado ko to aaisa hai ki yaad aane ke liye bhul na bhi jaruri hai. aur meri bhulneki aadat nahi hai wo to tum jante hi hoge uhi mai class main top nahi karti thi...u know na every year toper. aur khali sur per kaunsa price lagayenge so im not surpriced . aur baki sab thik hai mai ek mnc main kaam karti hu ,aur waha sara time nikal jata hai , tum kya kar rahe ho beside yaado ke Mr Bhulakad
b :- ha ha ha toper ..abhi bhi wahi attitude hai . badla nahi muje bhulakad kahete ho shayad tum bhul gai tumhare toper rahene ka hat trick maine breack jkiya tha jiske wajese 2 din ganga jamana bahai thi ankho se tumne. char din batte nahi ki thi. mananeke liye 5 cadbury 1 rose sharbat aur 3 pizza kha gai thi tab jake khuch fir se normal huvi thi. kya din the yaar
acha laga sunke ki tum job karti ho waise bhi tumhari khwaish thi apne pairo pe khade hone ki jo puri huvi...jarur boss giri hi karti rahogi waise bhi sun ne ki aadat to hai nahi tumhe. maine mere painting ke shokh ko professionalisum bana diya ...i m doing painting now a days jo ache daamo main bik jati hai aur ghar chal raha hai. nai nai jagaho per janeko milta hai aur kafi logo se jaan pahechan badh gai bhi jati hai
g : ohh pls chup hi raho tum tumhare top aane ke piche meri hi galti thi tumhe sikhte sikhate main hi padhai bhul gai .  ha ha aaj wo baate wo jagda yaad kare to hasi aajati hai. artist babu ...hath mai brush and tube ( paint wala off course may be tum kalakar logo ka khuch bharos nahi toothpast se bhi kam chalaloge ha ha) tum ne acha kiya jo painting chuna waise bhi tumhari tarah tumhari painting ko samaj na mushkil hai so logo ko khuch naya lage ga aur kharid te honge...ha ha no seriously u r very good painter maine tumhe kaha tha na ek din tum jarur bade kalakar banoge. tum ne meri bhi painting banai thi aaj tak sambhal ke rakhi hai aur logo se jabhi suna uske baare main muje wo din yaad aajate the. is liye kabhi tumhe bhul hi nahi paye Mr painter
b : ha yaad hai wo painting bana neke liye 4 din gaye the aur fir bas ek hi baat muje chu kar chali gai thi tumhari jab dosto ne kaha tha ki painting mai aur tum main koi farak nahi hai. aur tumne jat se javab diya tha "ye meri tarah bol nahi sakti" sach baat thi aaj tumhari kuch painting mere pass hai per wo tumhari tarah muskura sakti hai per mujse baate nahi kar sakti. har din bhagwan ki tarah diwar per tangi raheti hai aur meri sari baate sunti raheti hai per javab ek baar bhi nahi deti bas wo us din se khamosh ho gai hai jis din se maine tumhe pucha tha college ke baad sath rahenge ya nahi...aur tumhara javab aaj tak main us hasti huvi tasvir se samaj nahi paya tha....aaj itne salo baad tumhe maine dekha gadi mai jate huve so socha apne Prabhu se puch lu is sudama ko jante ho ya nahi....
g : ohh meri khamoshi ko tum jante the meri majboori ko bhi tum jante the aur is liye maine tumhe khuch bataye bager waha se chale jana hi thik samja. ye baat nahi thi ki tumhari aankhe main nahi padh sakti thi per meri ki huvi padhai se muje mere parivar walo ke liye khuch karna tha mere liye khuch karna tha ...aur wo karte karte kab jindagi guzar gai pata nahi chala. tum khush nasib the jo tumhare pass meri painting to thi per yaha mere pass sivay tumhari yaado khuch nahi tha. wo jo photo humne sath main nikale the wo bhi albam tum chupake le gaye the last din ko. aur pls muje bhagwan mat banao bhagwan ke aangan se koi chori nahi karta aur tum bhagwan ki kafi chize chura gaye hai.....u better knw
b : jaise ke maine churai aur tumne chori karne di ..waha bhagwan ..ek hath se tali nahi bajti . tum bhul gaye mere liye humesha intazar karte the . khuch bhi chiz nai khane ko lai ho to sab se pahele muje hi dete the . kahi bhi jana hoto pahele main ja raha hu ya nahiconfirm karte the fir hi jate the so kaise kahe sakte ho ki main tumhe attantion nahi du ya muje tumse khuch feeling na ho. ab ye maat kahena ki ye to but obvious hai main aaise hi karti thi. tum khuch galat samje. tum samaj gai thi mere dil ki baat is liye us din meri aankho mai dekh kar bina khuch kahe chali gai.
g : main chali gai to kya tum muje piche se bulane nahi aasakte the kya????
b : matlab????
g : jaruri nahi ki har khamoshi ka matlab wahi ho jo khud ke dimag main chal raha ho. ek baar bhi aay tum puch ne ko kya socha tumne. bas painter babu ko ek aur bahana mil gaya painting nikal ne ka gum ke sagar main doob ke achi achi painting banai hogi aur aaj usi ke waje se chamak rahe honge.
b : kya tum khuch kaheti to pata chalta na muje laga ki tumhe pasand nahi aaya mera tumhare baare main sochna so maine apne dil par pathar rakh diya aur fir tumhe na milneki kasam kha li
g ;to fir ab kyu mile
b ; wo kasam ka koi maine time shedule nahi bana ya tha ki jite ji nahi milunga . jab tak ho sake nahi mila. per ab faida kya tumhari to shadi bhi ho gai rahegi
g : abhi bhi khayali pulav pakane ka band nahi kiya. mujse puch that i m married aur still happy?
b : to to kya tumhari shadi nahi huvi.....
g : tumhari huvi
b : nahi huvi, time hi nahi mila painting aur bahar ghumne se. tumhari shadi ?
g : mere pass to time hi time hai west karne ko so time pass karne ke liye ek do shadi karli hogi maine hai na. yahi soch rahe ho na
b : nahi nahi . achi baat hai nahi huvi to yahi umar hai shadi karneki . ek baar settle hojaye life main paiso ke sath to fir jeevansathi hi dhund na hota hai.
g :kis ne kaha nahi huvi , baate chalu hai engagement hone wali hai meri
b: ha to tumhe acha ladka mil gaya. verygood. kab hai engagement
g : ek baar bhi pucha kyu kar rahi ho? abhi waqt hai tumhare pass ? jindagi ne dusra moka diya hai. shayad humara milna koi sanjog to nahi ho sakta? 
ya sirf mere dost banke mere shadi ke albam mai ek gift leke photo nikal ne ke liye wapas aaye ho. mana ki  painting bolti nahi per jise dekh kar hasti hai us se wo kitna chahti hogi uska andazato dekhne walo ko hona chahiye ki nahi. painting ki muskan se agar use chune wala bhi muskura uthe uska matlab hota hai wo maan hi maan main khuch aaise relation bana chuka hai ki aatmiyata khud b khud us painting ke sath hojati hai.........kab samjoge tum
b : itne saalo ke baad... tum jo kahe rahi ho wo...kya karu main
g : date of engagement  is 1st may.........bye


Friday, August 17, 2012

कोशिश , koshish


कोशिश
हर इन्सान अपनी जिंदगी मैं कभी ना कभी या रोज की जिंदगी मैं जरुर एक बार कोशिश करता है. कभी कुछ पाने की, कभी जाने की, कभी खुशी के लिए, कभी गम भूलने के लिए. हम सब सुनते  है थोड़ी कोशिश करो मिल जाएगा या थोड़ी हिम्मत से काम लो हो जाएगा. क्या है ये कोशिश?
जब इंसान मैं निराशा छा जाती है. किसी भी तरीके से वो संभल नही पता है. मन मे चाह छुट जाती है और हार मानकर बैठ जाते है. तब जो चीज़ हमे  सब से जादा सहारा देती है और सब से जादा जिस चीज़ पे विश्वास होता है........ वो है कोशिश , एक उम्मीद की किरण को कहेते है कोशिश. हम से वो काम करवाती है जिसकी हमने आशा छोड़ दी थी, वो है कोशिश. हमसे हमारा परिचय करती है कोशिश. जिसे के बगेर हम कुछ अधूरे है ये अहेसास दिलाती है कोशिश.
कहेते है कोशिश करने वालो की हार नही होती. सिर्फ़ कदमो से कुछ नही होता होसले हो बुलंद तो चलने की उमीद कामयाब होती है. क्या हुवा जो कोशिश कभी नाकामियाब होती है. हम अगर इसकी गहराई को समज सके तो पता चले की नाकामियाबी मैं ही कामयाबी छुपी है. ना तो केवल एक शब्द है जो हमे अपनी जिंदगी से हटा ना है. कामयाबी फिर कदमो को चूमे गी. जैसे जैसे मन का विकास होता है हम निराशाओ से गिर ने लगते है. हमारी हिम्मत कमजोर होने लगती है . पर क्या कभी किसी १ साल के  छोटे बच्चे को देखा है हार मानते हुवे? नहीं ना. क्यों की उसे नहीं पता हार क्या होती  है और जीत क्या होती है. जब तक वो अपने पैरो पे खड़ा नहीं होता हर दिन कोशिश करता रहेता है. और एक दिन वो कामयाब होता है . और जो वो ख़ुशी महेसुस होती है वो सारी दुनिया की खुशी मिला लो फिर भी कम पडजाये वैसी होती है. आज की रोज मरा जिंदगी मैं कमियाबी सबको चाहिए पैर उसके लिए की जाने वाली कोशिश थोड़ी कम होनी चाहिए ऐसा मान ना है. मंजिलो पे पहोचना सभी को है, पर क्या सब को रोंदकर सब की उमीदो को ठोकर मारकर ही हम आगे बढ़ सकते है ?.. अगर हम सब से आगे निकल भी गए तो कमियाबी मनानेके लिए लोग तो चाहिए की नहीं? . अगर हम इन्ही लोगो को छोड़ कर चले गए तो फिर रहेंगे कहा? खुशिया बाटेंगे किस के साथ. एक दुसरे से हमे ये हमने जोडती है और एक दुसरो को प्रेरणा देने मैं ये सबसे आगे होती है. तो प्रेरणा से कोशिशे बुलंद होती है कोशिशो से राह मिलती है और राह के अंत मैं अपनी मंजिल पाने की चाह  मिलती है.  एक चाह पाने के लिए , एक ख़ुशी मना ने के लिए , एक पल जिंदगी जीने के लिए एक हलकी सी कोशिश मुस्कराहट हर चहेरे पे लेन के लिए ....करनी तो पड़ती ही है ...तो हम भी शुरू करे अपनी जिंदगी सवारने के लिए एक कोशी.......    

एक छोटा कोशिशकर 
जिगर पंड्या 

Thursday, June 21, 2012

आजा रे बारिश .....come monsoon






आजा रे बारिश .....जब कभी बारिश आने वाली होती है तब मेरे दिल मैं ख्याल आता है........कैसी होगी बारिश की वो पहेली बुँदे धरती के लिए ..कितना इंतजार करने के बाद कोई हमारे दर पर दस्तक देने आया है. इंतजार तो था पिछले कई महीनो से पर आते आते कितनी देर लगा देता है. जैसे किसी के इंतजार मैं हम जब खड़े हो तो एक सेकंड भी एक घंटो के बराबर लगता है . पर जैसे ही वो मिल जाये तो एक घंटा भी चंद सेकंडो की तरह गुज़र जाता है. वैसे ही बारिश की कुछ बुँदे गिरी और चली गई . अब के बारिश फिर से कब जमके बरसेगी उसके आस मैं और उसकी तलाश मैं अपने मन मैं एक लम्बी सी चाह देकर चली गई.

स्कूल चालू होगी, भागम दौड़ी फिर से शुरू होगी. बच्चो की शोपिंग से ले के घर के छत की मरम्मत का समय आगया. ताकि बच्चे तो बच्चे छत भी टपक कर सारे घर को गिला न करदे . बच्चो को हम रेनकोट पहेनाते है पर फिर भी वो गिले हो कर आजाते है. हम सोचते होंगे आज कल के रैनकोट मैं गड़बड़ है, पर ऐसा नहीं है. मैंने कई बचो को देखा है अपने रैनकोट की जेब मैं पानी भरते है और बटन खुले रखते है .क्र्रिश की तरह जम्प करते है उर धुदुम पानी मैं छलांग लगाते है. अब बोलो इतना करने के बाद कोई गिला होने से बच सकता है. हम भी तो करते है मजे. बस हम छाते के साथ होते है फिर भी गिले होजाते है . क्यों की हवा यहाँ वह कहा से भी बारिश का रुख मोड़ देती है .और बारिश भी ऑफिस जाने के टाइम और घर वापस आने के टाइम जोर लगा कर गिरती है. जैसे कहे रही हो बच के कहा जायेगा हमसे. और गुस्सा तब आता है जब कही बहार गए हो प्लान बनाके की आज बारिश मैं भीगेंगे ...तब करलो बात बारिश का नमो निशान नहीं. जैसे हम से आँख मिचोली खेल रहा हो. बारिश मैं भीग कर छींके बड़ी जोरो से आने लगती है ..हान्नंक चीईयीयी यी यी यी ..लो नाम लेते ही आगई. गरम गरम आग के उपर हाथ को शेकना, चाय की चुस्सकी या लगाना, फिर भजी के लिए घर मे या तो ऑफिस मैं ऑर्डर करना.तभी तो मजा है बरसात का
तो फिर मैं एक ऑर्डर कर के आता हु तब तक शायद बारिश आजाये या फिर गरम गरम घर वालो के बोल सुन ने मिलजाए .बारिश की याद मैं और इंतजार मैं एक अनोखा खयाल पेश है





...तू आये न आये बस तेरी याद जरुर चली आती है
...दे मोका खिदमद का एक बार जमी पर आकर
... बाहों मैं भर लेंगे तुजे जान समज कर .....
...फिर देखेंगे कैसे जाओ गे मेरी पनाहों मै आकर

जिगर पंड्या

Friday, December 9, 2011

मंजिल destination



मंजिल
हा हम सबको एक मंजिल की तलाश होती है हर वक़्त , जो हमारे लिए बनी है. जो हम ने निर्धारित की है अपने लिए. एक दिन उस मुकाम पर पहुचना है जहा से हमे अपने आप को देख ने मैं दिलचस्पी हो . लोग कहे "वाह , ये हुवी न बात ". अपने नक़्शे कदम पर चलने वाले भी हो. हम भी किसी के लिए रोल-मोडल बने. चलते चलते हम कहा तक आगये आज हमे पता भी नहीं . क्या सोचा था और कहा तक पहुचे उसका जरा थोडा टाइम निकल के आज हिसाब कर ले.
बचपन मैं बड़ी बड़ी इमारते देख ते थे लोगो को यहाँ से वह भाग ता देख ते थे . तब हमारे दिल मैं एक सवाल आता था. ये लोग इतना भाग क्यों रहे है? घर ही तो जाना है . फिर इतनी भाग दोड़ क्यों ? आज जब हम उनके पैरो मैं पैर डाल के ऑफिस जाने लगे तब पता चलता है, भाई भागना तो जिंदगी है और जहा पहोचना है वो मंजिल है. एक घर और दूसरा ऑफिस . बस ये दो नो के बिच जिंदगी पिस सी गई है. बोलो है ना? हम ने बचपन मैं ये करने की ठानी थी वो करने की ठानी थी, पर आज हम सिर्फ एक रोबर्ट की तरह फिक्स प्रोग्राम बन गए है . अरे बहार जाना भी अब एक प्रोग्राम जैसा ही होगया है , आज सन्डे है तो बहार घूम आते है . जहा जायेंगे वो पहेले से फिक्स होता है . फिर मजा जिंदगी का कहा है? हमने अपनी मंजील बस इन्ही लम्हों के लिए तै की थी ?
खुशियों को पाने के लिए वक़्त नहीं होता ये सच है पर हमारे पास वक़्त ही नहीं है खुशिया महेसोस करने के लिए ये कितने जानते है. कभी घर से निकलते है आइसे ही बिना मंजिल और बिना किसी तयारी के मजा आएगा वो भी दुगना गेरेंटी है . अपने फॅमिली को लेके निकल जाओ कही अन कही जगह पर कोई भी फिल्म देखने, या फिर किसी मंदिर मैं , सुबह की एक लम्बी लेजी सैर भी करनि चाहिए अगर आप रोज़ नहीं जाते तो. कभी उही रेअद्य हो कर एक उनकाही स्वीट डिश खाने या किसी फमौस जगह की चाट खाने जो घर से थोड़ी दूर हो और जहा जाना आना बहोत कम होता हो. मंजिल वो चीज़ नहीं है जिसे हमे खोज ते हुवे जाना है मंजिल वो चीज़ है जहा हमे तस्सली मिल जाये अपने आप को महेसुस करने की . अपने आप मैं संतोष पाने की . अपने हर एक पल को जीने की . जहा जाओगे वही आप को अपनी मंजिल मिल जाएगी. फिर जिंदगी मै जीने के चार दिन हो, या दो दिन. हमे हर पल जीने का मजा आएगा. लोग कहेते है, "सारी जिंदगी गुजर गई मंजिल की तलाश मैं". पर उन्हें क्या पता है मंजिल तो अपने खुद के कदमो से जुडी है. हर कदम पर एक नई दुनिया है हर कदम पर एक नई मंजिल.

जहा भी कदम ले चले वही नई मंजिल हम बनायेंगे
जिंदगी मैं गम हो या ख़ुशी हम हर पल जीते ही चले जायेंगे....
यहाँ वहा ढूंढे क्या ?
जब खुद ही मैं है तेरी मंजिल को पाने का रास्ता

Sunday, September 11, 2011

टोय स्टोरी , खिलोने





टोय  स्टोरी , खिलोने

याद है हम बचपन मैं जिस चीज़ के साथ खेला करते थे? जो सब से ज्यादा हमे अज़ीज़ थे , दोस्त होना हो वो हमेशा हमारे साथ रहेते थे. जि हा सुख हो या दुःख हो हमारे सिने से लिपटकर हमारी ही बाते सुना करते थे. वो थे हमारे खिलोने. ये टोपिक पर लिखने की प्रेरणा मुझे टॉय स्टोरी फिल्म देख कर मिली. कभी मोका मिले तो  देख लेना. बहोत अछी फिल्म है अपने मालिक और अपने दोस्तों से लगाव के बारे मैं. वो जिन्दा होके बोलने लगते है . मुझे भी याद है की मैं भी एक छोटा सा कुत्ता और ही-मेंन को लेके बड़ा ही रोमांचक अनुभव ता था. वो मेरे अकेले पन के साथी थे. 
   आप भी अपने खिलोनो से बहोत ही नजदीक होंगे. वो गाड़ी चलाना, उनके साथ बैठ के खाना खाना ,  छोटी सी बातो पे उनसे रूठ जाना ,या उनको ही लेके बहार जाना. एक बार मेरे घर पर कुछ महेमान आये थे और उसमें मेरा एक कॉम्पिटिटर था. मतलब की मेरे जैसा छोटा बच्चा भी था. फिर क्या था मेरे खिलोनो के साथ उसने खेल ना  शुरू किया अईसे  से वैसे कैसे भी वो खेलता था . मैं चुप रहा कुछ  देर पर कब तक ? वही से अपने पन और पराये पन की समज आने लगी. अपनी चीजों को कोई छेड दे तो बुरा लगता है वो समज आगया. पर आज भी दुसरो की चीज़े इस्तमाल करने मैं वो ख्याल जरा कम आता है. हमेशा अपने खिलोनो को बाजु मैं लेके सोता था. मोम या पापा उसे रख देने को कहे तो भी रात को लाइट बंद करने के बाद उसे वापस अपने पास लेके आता और अपनी बाजु  मैं सुला देता था. पर सुबह हमेशा वो मुझसे पहेले उठा होता था और शो-केस  के एके कॉर्नर मैं बैठा रहेता  था . अगर सच कहे तो सबसे पहेला अपना कोई दोस्त बना तो वो था अपना खिलौना . ना बोलके  अपने साथ हमेशा रहेके अपनी चपड  चपड  सारी  बाते शांति से सुन ना और  हमेशा अपने हा मैं हा मिलाना . क्यों की उसकी मुंडी / गर्दन हम ही हिलाते थे . नेवर से नो टू  अस . जहा जहा मैं रहूँगा वहा वो होगा ही.
   जीवन के बड़े खूबसूरत मोड़ पर वो मिला था. हम लोगो को पहेचान रहे होते है ये काका ये मामा ये दीदी पर इस की पहेचान कोई देता नहीं था इसलिए हम ने उसे अपना बनाया एक दोस्त की तरह. वही से हमने जाना अंजान लो गो से कैसे दोस्ती  बढ़ाना और करना होता है . आज  कुछ  बच्चो को देखते है तो  उनके लिए खिलोने यानि मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर होगये है . क्या ये लोग वो बोन्डिंग बना पाएंगे जो हम लोगो ने बनाई थी. अपने खिलोने आज भी हमे याद करते है किसी कोने मैं आज भी वो खड़े है आज भी अगर आप उसकी और स्मिले दोगे तो वो जरुर अपनी और वही मुस्कान डालेंगे. एकाद खिलौना धुंड   कर देखिये शायद आपके आस पास मिल जाये. और वो डोल जिस के बाल बना के बिगाड़ के हम लोग खेलते थे. आज दुसरो बचो को देखते है तो हम भी उनेके साथ अपनी एक अलग ही स्टोरी चालू कर देते है . किसी बच्चे के लिए जो खिलौना करता है शायद उसका उपकार हम नहीं भूल सकते . खाली समय मैं उसके साथ करने वाली उसकी किलबिल बाते उसके इमोशन सिर्फ वही खिलौना जान सकता है.  माँ - पापा को या अपने आप को कभी दूर रहेना पड़ता है बचो से तो सब से पहेले वो बचो के हाथ मैं खिलौना थमा देते है बस खेलो उसके साथ . कोई बचचो को कई सारे खिलोने मिलते है तो कई को एक या दो पैर जो भी हो हमे बड़े आचे लगते थे . 

आज हम इतने बड़े होगये है की याद ही नहीं कभी हमारे जीवन के साथ ये जुड़े हुवे थे . और हमने उन्हें थैंक्स भी नहीं कहा आज तक . हो सके तो अपनी जिंदगी का खुच वक़्त उसके लिए निकाल के उसे कहे देना और किसी के घर अगर कोई बच्चा हो तो एक अपना खास  खिलौना खरीद के देदेना. 

Sunday, July 31, 2011

pratibimb ....mirror



प्रतिबिंब

एक अक्स दिखता है दूसरी और , अपना सा लगता है कभी सपना सा लगता है , कभी उसी पर प्यार आता है तो कभी गुस्सा आता है, कभी घंटो बिता देते है , कभी एक जलक देख कर निकल जाता है, बस हर वक़्त अपनापन जताता है, अपनी ही जालक दिखा ता है वो.............वो है प्रतिबिंब....
दर्पण की भी अजीब दास्तान है हमारा चहेरा ,रंग, रूप खूप पहेचानता है. जो हम करे वो करता है. मुस्कुराए हम तो वो मुस्कुराता है. रो दे तो वो भी रो देता है. हमे अपनी ही हक़ीकत से मिला देता है...अक्सर कहेते है ना के तस्वीरे जुठ बोल सकती है पर आईना नही. आईना तो हमारी असली पहेचान है. हम जो है वही दिखा ता है. लड़कियो के लिए तो उनकी खूबसूरती का दूसरा नाम है. अगर किसी लड़की को मस्त सताना हो तो उसे साडी , चूड़िया , साज शिंगार की सारी चीज़े दे दो और फिर उसे बिना आईनेवाले एक कमरे मे छोड़ दो......बस फिर क्या है ...
दर्पण मैं जाकना हर किसी को अछा लगता है . अपना प्रतिबींब कैसा लगता है सब को उसकी उत्सुकता होती है. फिर वो काला हो या गोरा, छोटा हो या मोटा, लंबा हो या बौना. रेफलेक्शन देखने के लिए बस एक काच की दीवार ही काफ़ी है. अरे कई बार तो लोग गाड़ी के दरवाजे के शीशो मैं ही अपने आपको देख कर सवार लेते है. आईना मैं देख अपने आप को सवारना काफ़ी पुरानी प्रथा है. और लड़कियो से उनका नाता काफ़ी पूराना है. जबही किसी खूबसूरती की बात हो और उन्हे दिलकी बात कहेनी हो तो बस, आईने के सामने लेजाके कहे दो, दुनिया मैं इस से हंसिन लड़की मैने नही देखी . शर्मा ना तो पका है पर आपकी बाहो मैं उनका सिमट जाना और भी अछा लगेगा जब आप खुद भी देख सकोगे आईने मे की सिर्फ़ कहेने के लिए नही काहेते लोग "दो जिस्म एक जान है हम". किसी को तिरछी नज़रो से देखने के लिए भी ये काम आता है. तो किसी के दूर रहेके भी पास रहेने का ज़रिया बन जाता है. भीड़ मे भी आपकी नज़रे बनके उनके ज़रिए दूसरो का दीदार करा देता है. जब बाते ख़तम हो जाई तो इशारो के लिए ज़रिया बन जाता है. तुम जो कहोगे वो तुमसे वही कहेता है. जबही खामोश रहोगे वो भी खामोश रहेता है. अपनी तस्वीर अपने को ही बता ता है हम क्या है वो हुमि को सिखाता है. जल की तरह पवित्र है वो. आग की तरह ज्वलनशील है वो. पहाड़ की तरह सख़्त है वो. ज़मीन की तरह निर्मल है वो. जो भी है वो बहोत सरल और सीधा है वो. हुमारी दूसरी पहेचान है वो. अपना ही अक्स दिखत आपना प्रतिबिंब है वो.


जबही मुजे वक़्त मिलता है
मैं आईने के सामने जाता हू
अक्सर उस्से बाते करता हू
और खूब मुस्कुराता इतरता हू .
अपने ही आप से रोज मिल आता हू
जिसे मैं अपनी परछाई मानता हू
अपनी ही नज़रो से उसकी नज़रे उतार ता हू.
दिन मैं लोगो से कम प्रतिबिंब से जादा मिल आता हू.

मे और मेरी तन्हाई अक्सर ये बाते करते है दर्पण से.....
जिगर पंड्या.........
the mirror boy.  

Sunday, June 12, 2011

monsoon , मौसम



मौसम

एक बूँद गिरी मेरे बदन पर. तो लगा शायद बिल्डिंग के नीचे खड़ा हू तो किसी ने पानी डाला होगा. या फिर पेड़ पोधो को डालने वाला पानी गिरा होगा. पर उपर देख ही लेना चाहिए कुछ भरोसा नही है लोगो का कभी कभी मूह से भी पिचकारी उड़ाते है. पर नही वाहा कोई नही था थोड़ा आगे गया तो फिर से कुछ बूँद गिरी.  हा ये और कुछ नही बारिश की बूँदे थी.....मौसम बदल रहा है . तपती गर्मी से छुटकारा दिलाने आगाई है वर्षा रानी.
बादलो ने जैसे अपनी जगा बना ली और पहाड़ो से कहे दिया, दोस्त हम आगाय है प्यार का संदेशा लेकर धरती के लिए. "रिम जिम रिम जिम बारिश शुरू होगई माने या न माने मेरी तू हो गई ". ये एक एसा रोमॅंटिक मौसम है जो दिलो के साथ जिस्मो को भी प्यार से भिगो देता है. हम ना चाहते हुवे भी प्यार मैं गिर ने के लिए मजबूर हो जाते है. हर कोई अछा लगने लगता है. कुछ भीगे कुछ मचले हुवे अरमान बाहर आते है. और जब किसी अपने के साथ एक ही छत के नीचे कुछ देर खड़ा रहेना पड़े तो फिर क्या बात है.....
कुछ याद आया पहेली बारिश और वो समा. भीगे हम- भीगे तुम और ये भीगा रास्ता. कुछ पानी के सर्कल बन जाते है रास्ते पर जिसमे देखो तो वो दर्पण की तरह अपना चहेरा दिखाते है. कभी उस्मै अपने पाटनर को देख ईशारा किया है? करना... मज़ा आएगा..मन की बात धरती के आँचल से उनके आँचल से ढके दिल तक कुछ इस कदर पहोचेगी की शायद मीठी सी एक कॉर्नर वाली हसी मिलजाये. बस फिर क्या दिन बन जाए. पानी की बूंदे तो उनके जिस्मा को छू ही रही थी
अब तुम भी उनके दिल को छू लो तो बात संभल जाए. छोटी छोटी खुशिया ढूंड लेना जिंदगी है. वो ठंडी से कापना. उसमे एक ही बार अगर उनका स्पर्श हो गया तो फिर 240 का करंट लगना तो गेर्रेँटेड है. बारिश ने अगर साथ दिया तो ज़रा ज़ोर से गिरे, बस फिर एक ही शेड मैं किसी दुकान मैं साथ मैं खड़ा रहेने का मज़ा ही कुछ और है. बस फिर भीड़ बढ़ती जाए और आपकी दूरिया क़म होती जाए. एक चुस्की चाई की हो और एक ही प्लॅट मैं खाने वाले पकोडे 5 ही हो तो मज़ा आजए. 
वो 2 खाए, हम 2 खाए और अंजाने मैं 5 वे के लिए साथ मैं ही हाथो का स्पर्श फिर से होज़ाये. "उउइई मा"  तुम खा लो कहेके , दो नो का फिर से पकोड़ा रहे जाए. कोई बात नही आधा आधा खाने मैं मज़ा ही कुछ और है. sharing is the best destiny to wins others heart. ohh what a art ........
ना जाने ये आधा पकोड़ा तुम्हारी बाकी बची आधी जिंदगी को शेर करनेके लिए कोई हमसफर दे दे. बारिश मैं अक्सर लोग रोमॅंटिक हो जाते है, लड़किया हो या लड़के हर एक का देखने का नज़रिया बदल जाता है. रिम जिम बरसात मैं साथ मैं चलते चलते थोड़ा सा पानी भी उड़ा लेना चाहिए . भले बारिश का पानी तो जिस्म पे गिरता हो पर ये कुछ खास बूंदे , जो उनके हाथो को छू कर आई है उस मैं मज़ा ही कुछ और है. पब्लिक मैं प्यारी सी पप्पी तो नही दे सकते , तो आपके गालो
तक हुमारी और से ये पानी ही सही. बस छू ले तो लगे हमने आपको छू लिया. और फिर एक छोटी सी आँखो के इशारे के बाद मिलने वाली उनकी एक कॉर्नर वाली हसी........

ये लड़की या आधी हसी क्यू देती है पता नही? शायद हसी तो फसि का फ़ॉर्मूला याद है तो पूरी स्माइल देना नामुमकिन होजता होगा. खेर हम को तो महेंनत करते रहेनी है. बालो से टपकती हुवी बूँदे , कुछ गीले कुछ सुके हुवे कपड़े और बातो बातो मैं मंज़िल का ख़तम हो जाना. कितना जल्द मौसम भागता हे . यहा से अलग होना
है, तुम अपने रास्ते हम अपने रास्ते. टाटा कहेने का वो वक़्त थम ता ही नही. किसी को आँखो मैं बसा ना है पर ये बूँदे हर दम आँखे बंद करवा देती है. हाथ मिला ये तो कैसे ? अभी अभी शोक से उभर कर होश मैं आए है. फिर भी जब तक वो अपनी आँखो के सामने से दूर ना जा चुके तब तक "बाई" कहेते  रहेना अच्छा4 लगता है. फिर उनकी यादो मे खो जाना.
 वही जाना पहेचना सा रास्ता और वही 1 घंटे की स्टरगल फिर भी उस दिन पता ही नही चलता कब घर पहुच गये . ये मौसम अजीब है .........सबकुछ भुला देता है....

happy monsoon

Tuesday, May 17, 2011

GOD - great organizer and destroyer



भगवान
एक मज़ा देखा है आपने बड़े मंदिरो मैं हमेशा क़Q रहेगा..अरे अब भगवान को मिलने के लिए भी लाइन लगानी पड़ती है. जैसे दरदी बिना आपॉइंटमेंट डॉक्टर को नही मिल सकते वैसे जिंदगी के दर्दीओ को लाइन लगानी पड़ती है. डॉक्टर एक बीमार अनेक. वहा भी पैसे लेते है ओर यहा पैसे चढ़ते है..संभाल लेना भगवान थोड़ा टेन्षन चालू है. उन्हे खुश करने के लिए फूल भी चढ़ाते है  विथ मिठाई. इतना गर्लफ्रेंड के लिए करेंगे तो कम से कम वो दिन प्रसाद ज़रूर मिल जाएगा ( टर्म्ज़ ओर
 कंडीशन: प्रसाद की मात्रा ज़्यादा और कम हो सकती है डिपेंड ऑन फूल  ओर मिठाई). मुजे नही पता उनका मॅनेज्मेंट कैसे होता होगा, यहा अपने फॅमिली के चार लोगो को संभाल ना मुश्किल है- वो करोड़ो लोगो को संभलता है. मज़ा कब आती है पता है, जॅब आप भगवान के पास इतने लंबे समय के इंतज़ार के बाद पहोच्ते हो , काफ़ी धक्के और लोगो की गुस्से भरी निगाहो से बचकर. उसी वक़्त मोटा पतला पुजारी कहे गा "जल्दी आगे भागो" अरे तेरी तो...मैने अभी माँगा कहा है? आधा घंटा लाइन मैं खड़ा रहा कम से कम आधा सेकेंड  तो देदो. अपने ही हाथ से बास्केट या फूल छीन के भगवान के कदमो मैं एसे लगाएँगे और फैक देंगे, जैसे मैने उन्हे कचरा फैक्ने को कहा था. "चलो चलो जल्दी करो" , भगवान को जैसे टाइम नही है ये उन पुजारी को भगवान ने खुद कान मैं कहा हो. मूज़े कभी कभी लगता है की इतनी भीड़ क्यू होती है मंदिरो  मे? सो अब पता चला की एक बार मैं पता ही नही चलता के भगवान दिखते कैसे है? कभी हाथ तो कभी पाउ, तो कभी सिर्फ़ फेस दिखता है. अब पूरे भगवान को देखना है तो इनस्ट्लमंट मैं आना पड़ेगा, तब जाके पूरे दिखेंगे . हर मंदिर मैं इतने लोग होते है की पता ही नही चलता भगवान किधर बसे है? जबही दूर से देखो दो तीन पुजारी का सर दिखेगा और गणपति से भी जाड़ा बड़ा पेट..लगता है लड्डू गणपति के बदले यही जाते है. कुछ मंदिरो मैं गणपति के चूहे के कान मैं कई लोगो को बोलते देखा है. दो महीने बाद मैं वाहा फिर से गया था तो देखा वाहा ग्रिल लगा दी गई थी. मैने देखा तो वाहा दूसरी चूहे की मूर्ति थी. एक कॉर्नर पे देखा तो पहेले वाली के आधे कान गायब हो चुके थे. ओह माई गॉड. इतनी रिक्वेस्ट आती थी ? शायद इसी लिए हमे भगवान के मूर्ति के बदले वाहा नीचे पदुकाए छूने को अलग से मिलती है. वरना हर महीने भगवान कैसे बदलेंगे?


हमारे भगवान जो सिर्फ़ सुन सकते है कुछ बोलते नही इसी लिए शायद हमे इतने अच्छे लगते है. सिवाय फ़िल्मो के आपने कभी प्रॅक्टिकल लाइफ मैं किसी को ज़ोर से बाते करते सुना है भगवान के साथ? नही ना. क्यू की मैं भी हू तेरे दर पर मूज़े भी सुन ले प्रभु. . यही सब की मान की इच्छा होती है क्यू की बाहर की जिंदगी मैं तो कोई भी अपनी सुनता नही फिर वो ऑफीस वाले हो या अपनी खुद के फॅमिली के लोग. लड़कियो की बात ना सुन ना तो यहा क्राइम माना जाता है. कभी कभी मूज़े लगता है लड़कियो के लिए हर लड़का  हर दिन भगवान ही बना रहेता होगा. सिर्फ़ सुनो कुछ ना कहो. हा पर भगवान की तरह अगर उनकी ईच्छाए पूरी नही की तो फिर लड़को का असली भगवान के पास जाने का अपोईंटमेंट पक्का है...
   खेर भगवान को अपना काम करने दो और हमे अपना. बस भगवान से यही गुज़ारिश है की जहा भी रहे मेरे साथ रहे ताकि मुज़मे हिम्मत बरकरार रहे दुनिया और दुनियादारी से लड़ने के लिए.

god bless me ,you and our problems



Tuesday, May 10, 2011

ekant



एकांत
अकेले बैठे सुना है कभी खामोशी को? मन जब शांत होता है, अपनी सारी और देखलो फिर भी कोई नज़र नही आता, बस मैं
 और सिर्फ़ मैं.......... एकांत मैं रहेना और खुद से बाते करने मे एक अलग मज़ा है. अपने आप के लिए कुछ देर वक़्त निकालना. अपने आप के ही कई पुराने नये कारनामे या अफ़साने याद करना और मन ही मन मे मुस्कुराना. खुली निगाहो से अपने ही सपनो मे खोजाना.  ना चाहते हुवे भी अपनी तन्हाई यो से प्यार करना. बिना कोई फोकस के बैठे रहेना और एक ही दिशा मे देखते रहेना. मन मे स्पाइडरमॅन की तरह, तरह-तरह की बातो के जाल बुनना ,फिर उन्मने ही उलज जाना...कभी कभी तो मीठी सी नींद मैं खोजना.....
अक्सर एकांत रात को जादा महेसुस होता है, जब हम सोने जाते है तब. अपनी ही छत को देखते हुवे कुछ देर सोच भी लिया करो, शायद उसी सफेद छत पे आपके ख़यालो की तस्वीर नज़र आजाए. हम जाके सीधे सो जाते है, या बुक्स लेके पढ़ते पढ़ते फुसस्स्स हो जाते है. कपल बाते करके सो जाते है और बड़े लोग भगवान का नाम लेते सो जाते है. खेर सोना तो चाहिए ही पर तोड़ा वक़्त निकाल ने के बाद. कभी कही बाहर गये हो तो कुछ देर आसमान को या नेचर को देख ते रहेने मैं भी मज़ा आता है. एकांत का सीधा जोड़ अपने दिलो दिमाग़ के साथ होता है. जबही आता है हमेशा मन को निर्मल शांत कर देता है. नया जोश नयी उमंगे नयी तरंगे वही से जाग उठती है. कभी मंदिर मैं जाके सोचा है, हम वहा सब से जादा सुकून क्यू मिलता है ? क्यू की वाहा सबसे जादा शांति होती है, एकांत .......वो भगवान खामोश रहेके अपनी खामोशी को सुन लेते है. हम मन मैं कुछ कहते है उनसे और चले जाते है ये मान के की अपनी मुसीबतो का बेड़ा पार होगया. पेर देर असल हम वाहा पॉज़िटिव एनर्जी लेने जाते है , जो हमे वाहा के शांत महॉल से मिलती है. जिस से हमारे विचारो को नई प्रेरणा मिलती है. मंदिर मे कोई भी शोर नही होता सिवाय एक घंट नाद के "टन" "टन" . एकांत को चिर के अपने ख़यालो से अपने भगवान को परिचय दिलाता. सुकून वही मिलता है जहा हमे  अछा लगता है फिर वो प्रेमिका की बहो मैं खामोशी से सोजाना   हो या फिर  तकिये को सिने से ज़ोर से लिपट के अपने ख़यालो मे खो जाना हो....जहा जहा एकांत मिले वही से नया सवेरा मिले, सो अपने अंदर के एकांत को ढुंढ़ो और खोजाओ अपनी नई दुनिया मे.

जिगर पंड्या

Tuesday, April 12, 2011

समय ....वक़्त.



समय
....वक़्त..
टिक टिक चलता हुवा ये वक़्त , कभी ना थामता हुवा, कभी ना रुकता हुवा.
जिंदगी को अपने साथ लेता हुवा गुज़र ता रहेता है ये वक़्त......
कुछ उजलीसी किरनो के साथ सूरज को अपनी पनहा मैं लेके दिन की
शुरुआत करता ये वक़्त....
तपती धूप मे खाने पिरोस ता तो कभी लोगो को अंगड़ाई दिलाता ये वक़्त.
शाम के मौसम मैं सूरज को अपनी बहो मैं समेट ता हुवा ये वक़्त..
रात के आँचल मैं चुपके से छुप जाता ये वक़्त.कुछ अपना सा 
कुछ बेगाना सा है ये वक़्त, हर किसी की ज़रूरत है ये वक़्त..


हर किसी को अपने बस मैं करना होता है ये वक़्त, हर किसी का अरमान है
ये वक़्त
बचपन से बुढ़ापे तक अपने साथ को निभाता ये वक़्त. कुछ अंजाने लम्हो 
का साथी है ये वक़्त , यादो मैं बसा सके एसा है ये वक़्त , कुछ
चीज़ो को भुला देता है ये वक़्त , दर्द का आहेसस है ये वक़्त, उसी दर्द की
दावा भी बन जा ता है ये वक़्त. एक ही पल मे किसी की ख़ुशियो का दामन
भर देता ये वक़्त तो किसी को दुख के सागर मैं डूबा देता ये वक़्त....
मा का इंतज़ार बनजता ये वक़्त, तो कभी पापा के पिक्निक लेजा ने का वक़्त ,
दोस्तो के वजेसे भूलजाते है ये वक़्त, वही हस्पताल मी एक एक मिनिट को
साँसे रुका देता ये वक़्त. हमे हमसे चुरा लेता ये वक़्त तो कभी ह्म्को ही
अपने आपसे मिला देता ये वक़्त. इस से ही अपनी जिंदगी शुरू होती है, नक्षत्र से
अपनी पहेचन होती है. अपने नाम की कहानी शुरू होती है और अपने
स्कूल से अपनी मुलाकात इसी वक़्त के साथ चलने से होती है.लोगो का साथ
वक़्त बे वक़्त मिलने लगता है, फिर अपना भी एक ग्रूप बनादेता है ये वक़्त.
अपनो से बिछड़ कर दूर लेजता है तो किसी अंजाने चाहेरे से प्यार करा देता
है. गुजर जाता है हर वक़्त लम्हा लम्हा करके फिर पकड़ा देता है हाथो
मैं काठी. 24 घंटे घूमता रहेता है ये वक़्त. हमारा वक़्त ख़तम
होजता है पर वक़्त का वक़्त ख़तम नही होता. एसी पहेले भी जिंदगी
चलराही थी संग उसके, हमारे बाद भी जिंदगी चलेगी संग उसके...बस
थम जाएगे तो हम और हमारी दीवालो पे तंगी हुवी तस्वीरे..........वक़्त
एक याद बनके रहे जाएगा लम्हा जिंदगी का उसी हाथो से फिसल जाएगा सो
आओ कुछ करे ..इस वक़्त को हम अपना बनाके इस पल को जिले.....


Sunday, March 27, 2011

PATH


पथ..........(रोड)
जिसे आम जिंदगी मैं रास्ता काहेते है...जिंदगी की सुबह ईसी पर पाव रख के खड़े होके होती है और रात को भी उसी रास्ते पे सोते हुवे ख़तम होती है. हर किसी की मंज़िले ईसी रस्ते ने जोड़ी हुई है. जहा भी जाना है ये रास्ता आप को वही लेजता है. जिंदगी की तरह ये भी नये नये सर्प्राइज़ देता रहेता है. कभी किसी मोड़ पेर मूड जाके, तो कभी नज़रे जहा तक जासके  वाहा तक अपनी आप को बिछाए हुवे. कभी सीधे तो कभी तेडे ,कभी उँचे तो कभी नीचे सरकते, कभी पहाड़ो मैं सुरंग बनके तो कभी समंदर मैं पुल बाँध कर अपने लिए और हमारे लिए जगह बना ही लेता है. फिर वो माउंट एवेरस्ट हो या सीलिंक ...बड़ी बड़ी ट्रक से लेके आम इंसान तक हर कोई इस पर निर्भर है, और सफ़र करता रहेता है.  रस्तो को तो आप जानते ही है अपने राँग ज़रूर बताए गा..........हर मोड़ का एक मतलब है. हर पथ पर एक कहानी है, आपकी मेरी और इस दुनिया के हर एक शक्ष की ....हर कोई रास्ते पे चलता है ..... फिर वो आम इंसान हो, क्रिमिनल हो या साधु संत.

 हर मौसम को देखता हुवा अपने मैं समता हुवा. चाहे तपती गर्मी हो या फिर बारिश का मौसम हो.... गर्मी मैं चटके देता तो ठंडी मे शरीर को सिकुड देता. पानी मैं कभी अपना प्रतिबींब बताता, तो कभी ठंड मैं धुवे मैं खो जाता रास्ता. गर्मी मैं पानी का आभास दिखता. कभी पेड़ पोढ़ो से सज़ा हुवा तो कभी रेगिस्तान की रेत से लिपटा हुवा रेत सा सरकता हुवा, तो कभी  पहाड़ो की माहेफ़िलो मैं अपना नाम गुनगुनता. इंसानो का घर की बुनियाद बनता बड़े बड़े इमारतो को अपनी मजबूत पकड़ मैं रखता. कभी हरियाली सी गास उगाता तो कभी अपने खाने के लिए अनाज उगाता खेतो मैं पानी पहुचाता. गाओं की गलियो से शहेर के रास्तो तक घर के आँगन से ऑफीस तक जाता. कभी खड़ो मैं तो कभी गतिरोधको से मिलता , कभी पथरो से तो कभी सीमेंट कोनक्रीट से बना सॉलिड रास्ता. रास्ते मैं चलते हुवे कई कहानिया आप से जुड़ जाती है, किस कहानी से आप सिख कर, आपने आप को किस रास्ते ले जाते है वही जिंदगी की फ़ैसला करता है
.

ऐसे ही चलते चलते मिल जाता है कोई ख़ास
जिसकी यादे हमेशा रहेती है दिल के पास

दूर जाते है लोग अपने अपने रास्ते
मंज़िल की तलाश मैं, कुछ पाने के वास्ते

चाहते हुवे भी मूडके वापस लौट नही पाते
क्योंकि वो भी तो जा चुके होगे उनके रास्ते

तो फिर चले एक रास्ता पकड़ के एक नई मंज़िल की तलाश मैं.

जिंदगी की डगर मे मुश्किल कुछभी नही होता
  जब रास्ता साथ हो तुम्हारे  तो  नामुमकिन  कुछभी नही होता.

Thursday, December 2, 2010

Monday, October 18, 2010

नरीमन पॉइंट........

नरीमन पॉइंट.........
मुंबई मैं आई हुवी एक एसी जगह, जहा कई लोगो के कई अरमान जुड़े हुवे
है.
 जी हा ,आज मैं उस जगह खड़ा हू जहा से एक कदम आगे मौत और एक कदम
पीछे जिंदगी खड़ी है. नरीमन पॉइंट......... आखरी छोर मुंबई शहेर का. एक और विशाल
समंदर जहा से शुरू होता है, वही दूसरी और मुंबई शहर की सड़के शुरू होती है.
फ़र्क सिर्फ़ दो कदमोका है. चमचमाती बिल्डिंग एक तरफ है तो दूसरी तरफ समंदर
की खामोश गहराई. मन मे कई सवाल उठ ते है क्या यही जिंदगी की
सचाई है? एक फेसला और एक फासला दूर होते है हम अपने मंज़िल से. हर
घड़ी हर मोड़ पर हमे दो रास्ते मिलते है. जाना कहा है वो हमे फैसला
करना है..एक मिस्टेक और जिंदगी के कई साल बर्बाद. उस ग़लत
फ़ैसेले का नाम तो होता है. यस जिसे हम बड़े प्यार से एक्सपीरियेन्स कहेते है.
जिसे पीछे छोड़ कर हम फिर से नया दाव और फिर से नई कहानी शुरू करते है.
हार से जीत तक का फासला तय करने के लिए यही तो काम आता है, एक्सपीरियेन्स.

यहा जितना सुकून मिलता है बैठ कर उतना ही दिल मचल जाता है ये देख
कर की जिंदगी कितनी अजीब होती है. तरह तरह के लोग यहा मिल जाते
है, कुछ कॉलेज के कपल तो कुछ यंग ग्रूप ,कुछ चाचा चाची
तो कुछ बच्चे और बाराती. सब अपने धुन मैं मगन कभी गगन को देख
मुस्कुराते है तो कही समंदर की छीटो को उड़ते देख चीलाते है. हर
एक का अपना अपना नज़रिया है. कोई जीने मरने के वादे करता है, तो कोई
अपने फ्यूचर के डेस्टिनेशन्स के बारे मैं चर्चा करता है , कोई मायुसी
छुपाने की कोशिश करता है तो कोई जन्‍म दिन मनाता है, कोई
अपनी सक्सेस पर खुशी मनाने आया है तो कोई हार्ट ब्रेक के कारण
समंदर का पानी बढ़ा रहा है. जगह एक ही है पर यहा दिखनेवाले
और महेसुस करनेवाले किस्से अनेक है. इसी लिए ये जगह बड़ी अजीब है.
 एक तरफ तेज दौड़ती गाडिया है तो एक तरफ अपनी मस्ती मैं स्लो चल रही
बोट है. जभी देखोगे एक नई कहानी काहेता ये समा दिखेगा और छोड़ जाएगा
आपके स्मृति पटल पे एक अनोखी याद.........

ए दिल है मुश्किल जीना यहा ज़रा बचके ज़रा हटके यहे मुंबई मेरी जान......



Sunday, October 17, 2010

बस ......

बस .............घुर्र्ररर
या कहे बस..........स्टॉप
हा हा ...या चलो कहेते है बस स्टॉप , जहा से रोज कई जिंदगिया यहा से वाहा सफ़र करती है| मानो जिंदगी घर से बाहर वही से शुरू होती है| वक़्त किसी के लिए रुकता नही और हम कभी भी वक़्त से पहेले कही पहुचते नही, ये जिंदगी है हर एक आम इंसान की| बस से शुरू होती है और वही बस पे ख्तंम होती है| इतनी भीड़ भाड़ मैं भी हम उसका साथ छोड़ते नही , क्यू छोड़े वही तो एक है जो कम दामोमे सही जगह पर पहुचाती है| कई क़िस्से है इस बस के| कभी टाइम से पहेले आजाती है तो कभी आती नही| एक बार इंतज़ार का मीटर लगा के देखोगे तो यारो माहेबूबा जल्दी आती है पर बस , बस... बस नही आती | आती है तो जगा नही होती, जगा मिल जाए तो, वो तेज नही दौड़ती, तेज हो जाए, तो सिग्नल नही छोड़ती ,सिग्नल छूट जाय तो स्टॉप पे नही रुकती | कभी कभी चालू बस को पकड़ ने के लिए इतनी दौड़ लगा नि पड़ती है की पूछो मत्त!! बस पकड़ ने के चक्कर मैं हम बस से भी तेज दौड़ जाते है...वो ड्राइवर बस का ब्रेक लगा ता है, पर हम इतने तेज होते हे की हमारा खुद का ब्रेक लगते लगते बस  का ड्राइवर तो क्या बस का नेमप्लॅट तक पढ़ सके उतने आगे निकल जाते है| जबकि चढ़ना पीछे से होता है| है भगवान अब ये वापस पीछे जाने तक रुकेगा की नही वो भी एक मुसीबत ही होती है| अछा है ऑफीस मैं पुराने जमाने की तरह धोती पहेंनके जाना नही पड़ता वरना इतनी भीड़ मैं किसी ने धोती पे पैर रख दिया तो अपनी तो स्वाहा...(ना कोई उपर नीचे ,ना कोई आगे पीछे ,बोलने वाला , ना कोई बोलने वाली, जानबे आली ..अपना क्या होगा...)| खेर अंदर का महॉल भी कुछ अजीब होता है| एक तो लोग सीढ़ी से उपेर चड़ते नही और जो चढ़ गये होते हे वो आगे बढ़ते नही| जैसे के कॅनडॉक्टर उन्हे पैसे देने वाला हो वैसे उसके आगे पीछे चिपक जाते है "अरे वाह मेरे बस मैं आने के लिए लॉजी सामने से पैसे लो"| उसमे कुछ हीरो लोग बस के दरवाजे पे ही खड़े रहेंगे "क्यू भाई , इतना ही शोख है तो फाइव स्टार होटल के दरवाजे पे खड़े रहो कम से कम थोड़ी बहोत आमदनी होज़ायगी"| खेर ये नही सुधरेंगे हमे हि अंदर आगे जाना होगा| फिर बेचारा ये दिल कुछ पल बैठने के लिए मचलेगा| पर वाहा पहेले से बैठे होंगे जो लोग वो इस नज़र से देखेंगे की बस मैने अगर जगा नही दी तो मेरी गोदी मैं ही बैठ जाएगा| सो नज़रे भी मिलाएँगे तो एईसे जैसे वही से दूर जाने का इशारा करते हो| वैसे अपने खड़े रहेनेका अंदाज भी अजीब होता है| कुछ इस तरह अपनी पोज़ीशन लेंगे की आधे से ज़्यादा शरीर बैठने वाले के उपर डाल देते है| खेर ज़िदगी है, हर किसी का अपना नज़रिया है| बस अपनी मंज़िल पे वो बस पहुचा दे वही बस है वरना यहा तो स्पाइडर मेन की तरह यहा से वाहा हाथो को मजबूत पकड़के लोगो की भीड़ से बचके आगे अपने शरीर को लेजना भी एक अलग ही अदा है| अगर आप सही वक़्त पे उठ कर आगे निकल गये तो ठीक वरना पता चला की आपका बस स्टॉप पीछे रहे गया है और आप दो स्टॉप आगे निकल आए हे| सो अगली बार ज़रा सम्भल के जाना इसकी मज़ा या सज़ा लेना आपके हाथो मे है| वरना कही कहेते ना रहे जाए बस अब तो बस करो स्टॉप मेन स्टॉप इट......

Friday, October 1, 2010

जिलो जिंदगी

जिलो जिंदगी
जिंदगी बड़ी अजीब कीसम की होती है , कभी हार तो कभी जीत होती है | जिस पहेलू को हम समज नही पाते उसेभूल जाना ही अछा होता है वरना परेशानी बढ़ते बढ़ते इतनी बढ़ जाती है की पता ही नही चलता चलना शुरू कहा से किया था|  आज खुशी की कीमत इतनी जादा बढ़ गई है की उसे ढूंड ने के लिए हमे बाहर अलग अलग जगहो पेर जाना पड़ता है| यहा वक़्त ही जैसे नही है किसी के पास हर कोई अपनी मंज़िल की और दौड़ रहा है और घर आते ही घर के कामो मैं व्यस्त हो जाता है| दोस्त और सगे संबंधी बस अब नाम के लिए ही रहे गये है सच कहे तो यारो घर के सदस्यो को मिले ही हफ़्ता हो जाता है| पापा मम्मी सिस्टर भाई ये सब तो जैसे टीवी  सीरियल जैसे होगये  है| हफ्ते मैं एक दिन मिलेंगे वो भी हाफ़ अन अवर| अपनी दुनिया मैं मस्त रहेना अछा है पेर कब तक? वीक एंड जैसे की आराम करने मैं ही गुजर जाता है अपनेपन का आहेसस होते होते सामने वाला कही दूर निकल जाता है|
वक़्त कभी किसी के लिए नही रुकता है हमे जितनी जिंदगी मिली है उतने मैं खुश होकर गुज़ारा करना सीखना होगा | बचपन मैं मैने एक सीरियल देखी थी जिसका सॉन्ग आज भी मूज़े प्रेरणा देता है |

आँखो मैं रोक ले तू ये आँसू ओ का तूफ़ा
लेती है जिंदगानी हर कदम पे एक इम्तहा |

और एक गजल थी " मंज़िल के बदले पाउँगा कुछ यादे और कुछ आँसू
मुजको ये मालूम है लेकिन साथ मेरे कुछ दूर तो चल"    

लोग जब जहा मिलते हस ते खेलते अपना समय उनके साथ बीताओ क्या पता कल हम होना हो||
बस सिर्फ़ यादे रहे जाएँगी दिलो मैं एक तेरे आने से पहेले और एक तेरे जाने के बाद...............